मीनाक्षी अवस्थी 'छाया'
बिलासपुर, छत्तीसगढ़।
विषय......परिणय परिणति.....
रक्त बिंदु से सींची बगिया, पर काँटों की बाड़ मिली,
बहुत बिखेरी खुशियाँ फिर भी, अश्रु बिन्दु की बाढ़ मिली.....
बिछुड़ गयी जननी और माँ का, शब्द पराया जान पड़ा,
भावनाओं के परिवर्तन में कर्म सदा ही आन अड़ा...
आन अड़ीं जननी की सीखें, आन अड़े कर्त्तव्य बोध,
शब्द अधर तक आते आते, पा जाते जिनसे अवरोध।
बार बार ताने सहने को हृदय वज्र बन आन अड़ा,
अपमानित हो बार बार, इनको देती सम्मान बड़ा।
दुःख निगलकर आँसू पीती, काया एक पहाड़ मिली
बहुत बिखेरी.....।।
सप्तपदी ने बाँधा तन को, वेदी जीवन बाँध गयी,
सात वचन ने हारा मन को, मैं वचनों के साथ भयी,
लाँघ गयी फिर जनककुटी मैं, घर आँगन खुशियाँ सारी..
गुलशन पिय का पाने निकली,छोड़ पिता की फुलवारी।
जीवन भोर की लाली सा था, किंतु निकट अवसान खड़ा,
घर की आन बहू से जादा, था उसका सामान बड़ा...।
गीला काठ सुलगता जैसे, जल में भीगी दाह मिली,
बहुत बिखेरी खुशियाँ फिर भी...।।।।
आँसू को मुसकान बनाते,सब प्रयत्न नाकाम रह गये,
बिखर गयीं किलकारी सारी, हास सभी गुमनाम रह गये।
देखा कुटिल दैत्य का नर्तन, सुँदर मानव काया में,
विस्फारित हो फटे रह गये,नेत्र मृत्यु की 'छाया' में....
पिय की बाँह भुजँग बन गई हर कोई पीछे आन पड़ा,
राख बन गई देह सलोनी, मातृपक्ष हैरान खड़ा....
सँस्कार के नाम पे केवल ,व्यापारों की बाढ़ मिली...
बहुत बिखेरी खुशियाँ फिर भी अश्रु बिन्दु की बाढ़ मिली...।।
मीनाक्षी अवस्थी 'छाया',
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