जिला-कांकेर,छग
शीर्षक- *जीवन के पड़ाव*
विधा-कविता ( मुक्त छंद)
अलंकार-उल्लेखादि अलंकार
जीवन एक सफर है,
जिसमें धूप- छांव,
ऊबड़-खाबड़ राहों में
मिलते हैं नरम घास,
कोमल फ़ूल पर
ओस के बूंदों- सा
क्षणिक सुख।।
और फिर झोली भर दुःख
जो कभी न खत्म न होने
वाले पहाड़- सा तपिश
लिए जला देता है कोमल
मन के मासुम सपनों को।
बचपन खेल कूद में गुजर
जाता है अनायास यौवन
दस्तक दे सपनों को साकार
करने की मांग में खरा उतरने
घिस जाता है मेंहदी की तरह।
प्रौढ़ावस्था सीखा जाता है
कि सपने हमेशा सच
नहीं होते हैं और तभी
दस्तक देता बुढ़ापा
सीखा जाता है एहसास।
जीवन के हर पड़ाव
देते हैं मौका अपने
अस्तित्व को बचाने
के लिए पर फिर भी
पड़ाव शेष रह
ही जाते हैं अनचाही
मौत के बाद भी।
*मीरा आर्ची चौहान*
*कांकेर, छग*
_________________________
उल्लेखादि अलंकार-
1-कोमल फूल पर ओंस की बूंदों -सा क्षणिक सुख।
2-यौवन घिस जाता है मेंहदी की तरह।
3-बुढ़ापा सीखा जाता है
एहसास।
4-पड़ाव शेष रह ही जाता मौत के बाद भी ।
---------------------------------------
No comments:
Post a Comment