जिला-महासमुन्द, छत्तीसगढ़।
शीर्षक:"स्वर्ग सुख"
विधा-कविता(तुकांत)
अलंकार-रूपक अलंकार
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ऊँची-ऊँची पहाड़ियाँ,कहीं समतल आकृति।
अमृतजल प्राणवायु,बाँटे है हर कहीं प्रकृति।।
रूकता नही वर्षाजल,फिसलपट्टी ढाल में।
नदी पेड़ पर्वत फसलें,सजते एक थाल में।।
मदहोश होकर हवाएँ, छूती हैं धरा का बदन।
कोना-कोना धरती का, बना सबका इंद्रसदन।।
पखेरू भरे उड़ान ऊँची,नभ में पवनचाल में।
दाना चूगने विश्रांति को,उतरे धरा हरहाल में।।
मौसम करवटें बदलकर,आता नये जोश में।
वसुधा के वासिंदे पाते, स्वर्गसुख आगोश में।।
🏡🙏बेहतरीन
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