जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- वसुधा
अलंकार :- रूपक अलंकार
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दुपहरी की आभा ओढ़े,
शर्माती दुल्हन धरा।
आसमान से मिलने को,
उर में जिसके भाव भरा।
हरियाली छाई चहुं दिस,
ओढ़ी हरी चुनरिया।
संवर कर सजनी बैठी है,
जाने कब आए सांवरिया।
पावन पवन चंचल बहता है,
छू कर हृदय को जाता है।
प्यारी सी प्रेयसी वसुधा में,
प्रीत भाव भर जाता है।
उसपर है इंतजार कि,
कब आएंगे ऋतुराज।
सरसों के फूलों से फिर,
होंगे वसुधा के पीले हाथ।
मन - मीन विकल होकर वसुधा का,
प्रीतम बसंत की राह तके।
कर टेक निहारें एक टक राहें,
अब तो जैसे हो नैन थके।
फिर शाम सुहानी संध्या रानी,
प्रीत की घघरी उडेंले हैं।
देख उसे फिर कोकिल वसुधा,
प्रेम राग ही घोले है।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने वसुधा की सुन्दरता को शब्दबद्ध करने का प्रयास किया है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने रूपक अलंकार का प्रयोग किया है।
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