Thursday, August 27, 2020

कांकेर से नलिनी बाजपेयी की रचना- पर्यावरण

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,जिला-कांकेर
विषय :- *पर्यावरण साँसों का नाम*
     (मानवीकरण अलंकार का प्रयोग) 
  
~ ×~×~×~×~×~× ~

*पर्यावरण साँसों का नाम*

पर्यावरण 
 साँसों का नाम है,
  प्रकृति का आवरण 
   ही पर्यावरण का धाम है।

पर्यावरण 
 ही धरा की शान है,
  प्रकृति को बचा लो 
   यही सबसे बड़ा ज्ञान है।

प्रकृति करे पुकार,
 मानव मत बनो अनुदार,
  रक्त-रंजित हो रही धरा,
   अब तो सुन लो मेरी पुकार।

जंगल,जमीन,हवा,पानी सब  
  हमने बाँटा नियमानुसार,
   तुमने नियम तोड़ा 
    अब हो रहे हो बेहाल।

जंगल काटे,हवा बिगड़ी 
 पानी का क्या बताएं हाल,
  बून्द-बून्द को तरसोगे,
   प्रदूषित वायु से कब तक बचोगे?

जीना 
  मुश्किल हो जाएगा,
    धरा से मानव का
     अस्तित्व मिट जाएगा।

 त्राहि-त्राहि मच जाएगी,
  सारी संस्कृति मिट जाएगी।

सारी करनी तेरा मानव,
 हम पर दोष लगाते हो,
  पर्यावरण बदल रहा है,
   ये सबको बताते हो।

जल,धरा,विजन का दोहन 
 कर,धरा विषमय बनाते हो,
  जंगल काट 
   पानी में गन्दगी फैलाते हो,
    तुम अज्ञानी अपने पाँव पर
     कुल्हाड़ी खुद चलाते हो।

प्रकृति की हर 
 सौगात को तरसोगे,
  जग में झूठा 
   प्रश्न उठाते हो।
    प्रकृति का दोहन कर
     प्रदूषण फैलाते हो।

जग जाओ मानव 
  पेड़ लगाओ,
   पर्यावरण रक्षण कर 
     प्रदूषण दूर भगाओ।

पर्यावरण 
 साँसों का नाम है,
  प्रकृति का आवरण 
    ही पर्यावरण का धाम है।

पर्यावरण ही
  धरा की शान है,
    प्रकृति को बचा लो 
      यही सबसे बड़ा ज्ञान है।


*मानवीकरण अलंकार का प्रयोग*
1.प्रकृति कर रही पुकार,मानव मत बनो अनुदार।
प्रकृति का दोहन कर प्रदूषण फैलाते हो।
3.रक्त रंजित हो रही धरा।

     नलिनी  बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर,(छ. ग.)

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