ग्राम -बुलाँकी
जिला -रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय- मित्रता(असम अलंकार)
विधा-कविता ( मुक्तक छंद)
शीर्षक- " मित्र स्वरूप"
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" मित्र स्वरूप"
तू ही इष्ट तू ही मित्र,
तू ही ज्ञान तू ही सत्य।
तू ही व्यापक तू ही नित्य,
तू ही असम है तू अद्वितीय।
तू नित्य है तू प्रकाश है ,
तू आदी है तू अनादी है ।
तू परगामी ,तू पारदर्शी है ,
तू मित्र मेरे समदर्शी है।
तू अछेद है तू अभेद है,
तू अखंड तू अनन्त है।
जड़ चैतन्य तेरा स्वरूप है,
तेरा स्वरूप जैसा न रूप है।
तू श्रेष्ठ मेरा तू मित्र है,
हर पल तू मेरे साथ है।
तू ही ऊर्जा तू शक्ति है,
तेरी शक्ति ही जीने का आधार है।
तू ही राम है तू श्याम है,
तू ही मित्र मेरे पालनहार है।
तू मूल ऊर्जा मै ऊर्जित हूँ,
तेरी कृपा से मैं संरक्षित हूंँ।
तू मेरा ईष्ट तू अभीष्ट है,
तू नित्य वर्तमान तू अरूप है।
अद्वितीय असम तेरा स्वरूप है,
जड़ चैतन्य में तू ही तू है।
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व्याख्या:- इस कविता में कवित्री ज्ञान अर्थात ईश्वर को मित्र स्वरूप मानकर उसकी महिमा का वर्णन की है। परमात्मा को मित्र मानकर मित्रवत् आचरण की कामना की गई है।
असम अलंकार
परमात्मा जैसे और कोई वस्तु नहीं है।
ज्ञान से कोई अद्वितीय नहीं है।
सत्य से श्रेष्ठ और कोई नहीं है।
वर्तमान जैसे और कोई वस्तु नहीं है।
ईश्वर जैसे समदर्शी कोई नहीं है।
उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़
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