कवयित्री: डॉ बी निर्मला, "राजी",
जिला: मैसूर,
राज्य: कर्नाटक,
शीर्षक: मेरे पिता
कविता - मेरे पिता
उन्नत हिमालय जैसे मेरे पिता,
उठना,चलना मुझे दिखाया,
क्रोध में अपना प्यार छिपाया,
संयम व धैर्य का पाठ पढ़ाया,
सभी कामों को सही तरीके से,
करने का हुनर भी मैंने सीखा,
दिन रात,सुख दुख,दर्द,कष्ट,
कभी न वे विचलित न होते,
आए जीवन में जबभी संकट,
बड़े धैर्य से वे सामना करते,
आभास ना होने देते हमें दुख,
सब खुद अकेले ही झेल लेते,
बीमार मेरी मां सदैव जीभर के,
सेवाकर अपना फ़र्ज़ निभाते,
जीवन भर हमें किसी कमी का,
कभी अहसास ना हमें होने दिया,
जो हो सका बड़ी मेहनत से,
श्रेष्ठ विद्या का दान हमें दिया,
कैसे भुला दूं उन्हें,मैं तो हूं,
जीवित उनकी बदौलत से,
कोई काम नहीं था अछूता,
सारे काम मैंने उनसे सीखा,
थे वे मेरे लिए छाया,सहारा,
रक्षक,शिक्षक,पथ प्रदर्शक,
सपनों को किया हकीकत,
सदा रहे वे मेरे मार्ग प्रदर्शक,
सदा श्रद्धासे कर्तव्य निभाया,
देश में उन्होंने नाम कमाया,
मैं उनकी बेटी,चलूं उसी राह,
उनके पदचिन्हों मेरी मंजिल,
पिता पर सदा नाज़,गर्व करूं,
शत शत प्रणाम,नमन करूं।
रचियता:
डॉ.बी.निर्मला,
मैसूर।
स्वरचित कविता,
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