नाम; डॉ गुरिंदर गिल
लाहड दातु, साबाह,
मलेशिया। { अभी इन दिल्ली }
वियोग रस
यह सावन की बारिशों में कहाँ पहले सी रवानी है
चाँद की चांदनी भी न रही पहले जैसी सुहानी है
मेरे गीत ग़ज़लें नज़्में कविता मेरे अंतर्मन की पीड़ा है
लिख देते है वियोग यह न कल्पित कोई कहानी है
सुख लिखो तो दुःख मिले ज्ञान से आये है अहंकार
कर्मों से बंधन और प्रेम तो वियोग की निशानी है
प्रेम तो आखिर प्रेम है और प्रेम से जगे अटूट विश्वास
प्रेम से बंधन प्रेम से त्याग कलम कहे अपनी ज़ुबानी है
प्रेम पीड़ा प्रेम आंसू प्रेम से कविता प्रेम से मिले प्रभु
प्रेम ही है शुन्य जिसकी मेरी रूह भी बेहद्द दीवानी है
यह एक तरफा मोहबत का भरम कि है दो तरफ़ा संजोग
जाने क्या लिखा है खुदा ने क्यों राधा कृष्णा सी अपनी कहानी है
शांत होने से पहले मैं यह ताना बाना बुन देना चाहती हूँ
करना है मुझे योग तेरे वियोग में और मोक्ष मुझे पानी है
सरवरचित
डॉ गुरिंदर गिल
दिल्ली - 56
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