Monday, August 31, 2020

महासमुन्द से विनोद कुमार "जोगी" की रचना- जीवन

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विषय :- जीवन के पड़ाव
शीर्षक :- जीवन में पड़ाव
अलंकार :- उल्लेख अलंकार

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जीवन ज्यों नदी का बहाव है,
जीवन में कई पड़ाव है।
कुछ समय तक विकट त्रासदी है,
कहते हैं फिर जीवन में ठहराव है।
बचपन का जवानी में जाना,
जवानी का सैटल हो जाना।
सैटल होने पर बुढ़ापा ठहराव है,
बुढ़ापे में जीवन मुक्ती अंतिम पड़ाव है।

पड़ावों में जीवन की खुशियां,
बचपन में खिलौने व सखियां।
जवानी में रोजगार ही आधार है,
बुढ़ापे में गर हो साथ बच्चे तो,
जीवन की खुशियां अपार है।

पड़ावों में आत्म संतुष्टि,
करती भिन्न-भिन्न बातें पुष्टि।
बचपन में निज इच्छा पूर्ति,
जवानी में घरवालों की पूर्ति।
बुढ़ापे में विरक्ति है, अलगाव है,
जाने जीवन में कितने पड़ाव है।

जीवन में कामों का जिक्र,
बचपन में पढ़ाई व खेल बेफिक्र।
जवानी में रोजी रोटी का हिसाब,
भरा भक्ति भाव बुढ़ापे में बेहिसाब।
सांसों का थमना कर्मों का ठहराव है।

पहले पहल लेटा हुआ,
घुटनों के बल फिर चलता हूं,
दो पैरों में चले फिर ऊर्जा का अभाव है।
फिर त्रिपाया, चौपाया 
फिर से लेट जाना ही ठहराव है।
जीवन में कितने पड़ाव है।

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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने जीवन के विभिन्न पड़ावों का वर्णन करते हुए विभिन्न पड़ावों में खुशियां, संतुष्टि, व परिस्थितियों का जिक्र करने का प्रयास किया है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने उल्लेख अलंकार का प्रयोग किया है।

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