रायगढ़, छत्तीसगढ़
विधा-मुक्त छंद
विषय-जीवन का पड़ाव ( उल्लेख अलंकार)
शीर्षक-जीवन गुजर रही
तू रचा है, बसा है, समाया है कुछ इस तरह
की सोच में हूँ तेरे बिन जियें तो किस तरह
माना तू बस एक पड़ाव है जीवन का
पर दिन में,रात में,हर पल में छाया है
सांसों को, धड़कनो को सुकून मिलता है तुझसे
जैसे जीवन के इस पड़ाव में ही संपूर्णता हो
काश की उन लम्हों को एक बार और जी लेते
चंद पल एक दूजे के वास्ते उधार मांग लेते
सपनों का, ख़्वाहिशों का,फरमाइशों का अंत कहाँ है?
गुजर रही है जो जिंदगी उसमें जीवन कहाँ है?
तू वहाँ बैचेन, मै यहां विकल प्रतीक्षा में कट रही
इस पड़ाव में ही जैसे जीवन गुजर रही।
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