रचनाकार-एच-एस-अरमो "अरमान "
निवास-बैरन-बाज़ार,रायपुर ।
जिला-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
विधा-,छ्न्द-मुक्त(कविता)
"यमक अलंकार "
शीर्षक:- "गुमराह " ।
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》~●••|||""गुमराह""|||••●~《
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लहू लहू को,आज पुकारता,
एक लहू ,देश के नाम कुरबाँ,
और एक लहू ,देवे जीवन दान ।
प्यार प्यार में,लूटा मुझको,
एक में दिल लूटा और की शादी ।
एक प्यार में,जेवर और लूटा राशि,
सोचा,वो जीवन भर,साथ निभाएगी,
पर,इसने तो,मुझे ही,डूबा गयी ।
रकम दुगनी करने की बात में,
हो जाते,लोग अक्सर गुमराह,
असली नोट,हो जाते,पल में गायब,
पर,मिले पोटली में,सिर्फ कोरे कागज,
लूटा लुटा मैं,इस चक्कर में,
एक बार रकम से,फिर लोभ-लालच में।
प्यार में,हो जाता,जो शख़्स अँधा,
नैन होते हुये भी,जो हो जाए अँधा।
गुमराह,कैसे हो जाए,उसे पता नहीं,
लुट जाने के बाद भी,होश नहीं ।
चुनावी दौर में,नेता से--
चमचा बोले,आपकी जीत पक्की है,
उस नाम से,नगदी उससे,झटकते हैं,
हार हो जाती तो,फिर मुँह छिपाते हैं।
अंग्रजों ने,हमें गुमराह किया,
देश को भी,गुलाम किया ।
दो सौ साल,हुकुमत किया,
और भटकाने का,ढोंग किया ।
रेल की यात्रा में,लूटा मुझको,
किया मेलजोल,उसने ऐसा,
हमारा हमदर्द हो जैसा,
मीठी-मीठी बातों से,फुसलाया,
कुछ मदद की व कुछ खिलाया,
और सो गए,तो बेहोश पाये गये ,
लुट गए तो,अपना होश खो दिये।
फेसबुक में,लगाया चेहरा किसी का,
लुभाया,भरमाया और फंसाया ,
लुटा लूटा,प्यार से उसने,
एक ने दिल और एक ने रकम ।
न मिटी ,अपनी गरीबी व लाचारी,
न हुए दूर,दुख,मुसीबत सारी,
ये कैसे,हैं आस्था के राग-दरबारी,
क्या इनमें भी,छायी अब लाचारी ।
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व्याख्या:-उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि जमाने में गुमराह के कई तरीके हैं,बस जानने की जरूरत होती है ।
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स्वरचित प्रस्तुति-एच-एस-अरमो
"अरमान "
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