जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा- "दीपकादि अलंकार"
विषय- दर्शन आधारित
शीर्षक- "जीवन"
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पंचजन्य का जीवन पंचतत्व में विलीन हो जाएगी,
गुरूर का चादर ओढ़ा तो मन मलीन हो जाएगी ।
धड़कनों की भाषा धड़कनों से समझना,
फिर दो जिस्म दो जान लवलीन हो जाएगी ।।
जीवन की व्यथा मरण समतुल्य हो जाएगी,
फिर भी जिंदगी जिंदगी सी बहुमूल्य हो जाएगी ।
शोणित में प्रवाह आह रहित रखना,
आह की राह में चाह ही अमूल्य हो जाएगी ।।
चारों ओर अंधेरा छाया मेरे अंतस की व्यथा जैसे,
घनघोर काली साया,काया है माया अन्यथा जैसे ।
मैं ही विजय मैं ही हार मात हूॅं,
कौन है समर में,मैं ही खड़ा हूॅं निहत्था जैसे ।।
सपनों से जी रहा हूॅं या सपनों में जी रहा हूॅं,
बीतते-बीतते सपनों में मैं सपना हो रहा हूॅं ।
गुफाओं कंदराओं से होकर लौटा हूॅं,
समझ समझकर बस मैं ही मैं अपना हो रहा हूॅं ।।
मेरी नजर मुझे लौटा दो नजर में सबके आऊंगा,
कायनात तू न बदल मैं खुद को बदल जाऊंगा।
सोंच मेरी हिमाद्रि की हिमशिखर में दफ्न है,
मुझे सुलगाओ मैं हिमालय को पिघला जाऊंगा।।
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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ ( छत्तीसगढ़ )
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