Wednesday, August 26, 2020

रायगढ़ से पुष्पा पटनायक की रचना- पावस

रचयिता- पुष्पा पटनायक 
स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़ 
विधा- कविता (रूपकअलंकार का प्रयोग) 
शीर्षक -"पावस "
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परात-बसुंधरा   बिखरे   दाने
कमण्डल -नभ   छलके पाने

प्रकृति की अनुपम छटा छाई
हिलोर  लहरों  की   अँगड़ाई

पर्वत  अडिग  रहा यह  देख
दन्त -हिम  मुस्कुराता अनेक

वनिता -वसुधा बनी सुहागन
वृहद  मंजर  अति   लुभावन

बयार - मुरली  की   शहनाई
अश्रु - घटा     धरा    भिगाई

पावन-पावस  की हो  विदाई
बाट  जोहते  अब  थलाकृति
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व्याख्या:- सावन में वसुधा हरि भरी होती है। एक दुल्हन की भांति ,हवा शहनाई बजाता है, मेघ रोते है ,पावस की विदाई होने से पृथ्वी के सभी कृति पावस के  फिर आने का रास्ता देखते हैं।
रूपक अलंकार-: परात-वसुंधरा बिखरे दानें, कमंडल-नभ छलके पाने, दन्त- हिम,वनिता -वसुधा, बयार- मुरली ।

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