Saturday, August 8, 2020

राजस्थान से कवि बजरंग लाल सैनी वज्रघन जी की कविता- रिश्ते

बजरंग लाल सैनी वज्रघन
राज्य राजस्थान
शीर्षक----रिश्ते

कभी-कभी सोचता हूँ,
रिश्ते क्यों नहीं होने चाहिए?
क्यों रिश्ते तोड़ते हैं आदमी से आदमी को?
क्यों फंसता है आदमी इस मकड़जाल में?
जबकि उसे पता है कि
वह एक बार फंस गया तो
फिर कभी निकल नहीं पाएगा,
खो देगा वह अपने सुख चैन को, 
जल जाएगी उसकी आनंद की खेती, 
स्वार्थ की लपटों से, 
जितना बुझाएगा उतनी ही भड़केगी, 
जितना निकलना चाहेगा, 
उतना ही फंसता चला जाएगा, 
अंततः उसी मकड़जाल में फंसकर, 
खो देगा अपना वजूद,
चंद रिश्ते निभाने के चक्कर में, 
बन जाएगा निवाला स्वार्थी रिश्तों का, 
जिनमें केवल तृष्णा है, त्याग नहीं, 
जिनसे विलग उसका अस्तित्व नहीं हो जैसे, 
ऐसे क्यों समझता और फिर फंसता जाता है? 
जो उसे पल-पल सीमित दायरों में
जकड़ लेता है,
मजबूर कर देता है, घुट घुट कर जीने को, 
वह कभी नहीं समझ पाता है, 
वह रिश्तों की भेंट चढ़ा अथवा 
खुद को चढ़ा दिया है रिश्तों की बलिवेदी पर, 
मैं भी तो ऐसा ही हूँ, 
पल-पल तिल-तिल कर, 
सुलग-सुलग कर, 
भूसे की दबी राख की चिंगारी-सा,
अविरल दहकता जाता हूँ, 
रिसता रहता हूँ, हर पल घड़ी की रेत-सा, 
कुछ कह नहीं पाता हूँ, 
रिश्तों की नाराजगी के डर से, 
रह-रह बिना पेड़ की डाली-से
 बच्चों का मुख सामने आकर,
 सवाल बन खड़ा हो जाता है, 
जब मैं पलायन की सोचता हूँ, 
मेरे अन्दर की रिक्तता मुझे, धिक्कारने लगती है, 
पर मैं ही क्यों निभाऊँ सारे रिश्ते? 
क्या रिश्तों का कोई फर्ज नहीं बनता? 
रिस रहा हूँ मैं शनैः शनैः बाँध के पानी-सा, 
कोई उपाय है?

*बजरंग लाल सैनी वज्रघन*

No comments:

Post a Comment

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...