जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
विषय :- सुख - दुख से भिन्न अनंत सुख।
अलंकार :- पुनरुक्तवदाभास अलंकार
शीर्षक:- आत्मसंतुष्टि
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मनुज मानव दर दर भटके,
है अनंत सुख की तलाश।
अंधियारे में जुगनू बने है,
जाने कब मिले प्रकाश।
कलह हो रही घर घर में,
कोई उन्नीस नहीं सब बीस।
रवि सूरज सा गरम अगर,
पिता के मन में है तपिश।
गज भर की जमीन की लड़ाई।
लड़ पड़ते हैं भाई भाई,
देखे रेखा लकिर खिंचते।
भाई बने हैं आज कसाई।
क्या होता गर पीछे हटते,
ना होता कोई एक बीस।
लोभ तृष्णा ना करता और,
रह लेता खुद उन्नीस।
पर यह जग जाहिर है की,
छोटी बात में बढ़ते क्लेश।
रिश्ते फिर तार तार होते,
मनुभाव विराजते द्वेष।
कस्तुरी मृग सा मानव है,
जग करता है इसकी पुष्टि।
सुख - दुख से भिन्न अनंत सुख,
है मानव की आत्मसंतुष्टि।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने मानव मन में उठे लोभ और लालच से घर घर कलह का जिक्र किया है साथ ही कवि ने यह भी कहा है कि आत्मसंतुष्टि ही सभी क्लेश का निवारण है जो की जग में अनंत सुख है।
काव्य में अलंकरण के लिए कवि ने कुछ पर्यायवाची शब्दों को साथ साथ प्रयोग किया है जिसमें हर शब्द के भिन्न अर्थ है जिससे पुनरुक्तवदाभास अलंकार की छटा बिखर रही है।
जैसे :- मनुज - इंसान
मानव :- एक नाम
रवि :- एक नाम
सूरज :- सूर्य
रेखा :- एक नाम
लकिर :- दीवार खड़ी करना
लोभ :- लालच
तृष्णा :- एक नाम।
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