विषय - मुक्त
विधा - छंद मुक्त कविता
अलंकार - ध्वन्यार्थ व्यंजना अलंकार
शीर्षक - युद्ध चित्रण
मारो-काटो लाश बिछा दो,
पीछे कभी न हटना है ।
जीत मिले या हार मिले ,
मृत्युपर्यन्त लड़ना है ।।
दो पक्षों की सेनाएँ ,
करते भीषण घोर युद्ध ।
दोनों ओर खून के प्यासे,
आपस मे हो रहे क्रुद्ध ।।
चतुरंगी सेनाएँ दौड़ी ,
घोड़े हाथी रथ पैदल ।
बिगुल बज गया रणभेरी का,
टूट पड़े निज शत्रु - दल।।
तलवारें गाजर मूली-सी ,
अरिमुंडों को काट रही ।
चमचम करती बिजली-सी,
लपक-लपक लहू चाट रही।।
गोला बरसे खूब दनादन,
आया भारी तोप ।
मौत का तांडव चहुँ ओर,
छाया मातम शोक ।।
वीर धनुर्धर चला रहे ,
सरसर - सरसर तीर ।
भाला खंजर से भी लड़ते,
प्राचीन योद्धा महावीर ।।
बख्तर-कवच धारण किये ,
करते भीषण संग्राम ।
देश-धर्म की वेदी पर ,
हो जाते बलिदान ।।
अब तो अत्याधुनिक है,
अस्त्र-शस्त्र हथियार ।
एटमबम राफेल मिसाइल,
जल-थल-नभ में करते वार।।
जाने कितने आयुध हैं,
घातक प्रलयंकारी ।
मानव समाज खतरे में,
विश्वयुद्ध की तैयारी ।।
युद्धों की गाथा अनेक ,
इतिहास में दर्ज है ।
सुख-शांति के लिये क्या,
उचित युद्ध-सा कर्म है ?
लीलाधर कुम्हार
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