Monday, August 10, 2020

बलौदाबाजार से लीलाधर कुम्हार की रचना- युद्ध


विषय - युद्ध पर केंद्रित
विषय - मुक्त 
विधा - छंद मुक्त कविता
अलंकार - ध्वन्यार्थ व्यंजना अलंकार
शीर्षक -  युद्ध चित्रण

मारो-काटो लाश बिछा दो,
पीछे  कभी न हटना  है ।
जीत मिले या हार मिले ,
मृत्युपर्यन्त लड़ना  है ।।
         दो पक्षों  की  सेनाएँ  ,
        करते भीषण घोर युद्ध ।
        दोनों ओर खून के प्यासे,
        आपस मे हो रहे क्रुद्ध ।।
चतुरंगी सेनाएँ दौड़ी ,
घोड़े हाथी रथ पैदल ।
बिगुल बज गया रणभेरी का,
टूट पड़े निज शत्रु - दल।।
     तलवारें गाजर मूली-सी ,
     अरिमुंडों को काट रही ।
     चमचम करती बिजली-सी,
  लपक-लपक लहू चाट रही।।
गोला बरसे खूब दनादन,
आया भारी तोप ।
मौत का तांडव चहुँ ओर,
छाया मातम शोक ।।
     वीर धनुर्धर चला रहे ,
     सरसर - सरसर तीर ।
    भाला खंजर से भी लड़ते,
    प्राचीन योद्धा महावीर ।।
बख्तर-कवच धारण किये ,
करते भीषण संग्राम ।
देश-धर्म की वेदी पर ,
हो जाते बलिदान ।।
      अब तो अत्याधुनिक है,
      अस्त्र-शस्त्र  हथियार ।
     एटमबम राफेल मिसाइल,
  जल-थल-नभ में करते वार।।
जाने कितने आयुध हैं,
घातक प्रलयंकारी ।
मानव समाज खतरे में,
विश्वयुद्ध की तैयारी ।।
     युद्धों की गाथा अनेक ,
     इतिहास में दर्ज है ।
    सुख-शांति के लिये क्या,
    उचित युद्ध-सा कर्म है ? 

   
     लीलाधर कुम्हार

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