Wednesday, August 12, 2020

महासमुन्द से विनोद कुमार "जोगी" की रचना- स्वदेशी

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
प्रदत्त विषय :- स्वदेशी
अलंकार :- अनन्वय अलंकार
शीर्षक :- स्वदेशी स्वीकार करें।

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बरसों से हम बंधे पड़े हैं,
निर्भर सदा है विदेशी पे।
आओ आज हम बदले रीत,
हाथ मिला लें देशी से।

खाएं खाना देशी सदा ही,
हो स्वाद देशी सा देशी।
ना कहें हम मैगी - नूडल्स,
ना खाएं हम पिज्जा विदेशी।

कपड़े, अपने कपड़े से हो,
हो सादी और हो खादी।
गर उनके ही कपड़े पहने,
फिर किस काम की आजादी?

अपने काम की चीजें भी हो,
बस अपने काम के जैसे।
अपने काम की चीजों के लिए,
क्यों औरों को हम दे पैसे?

गर अपना ही पहनें हम और,
बस अपना ही खाएंगे।
इसी तरह से अपने ही अर्थ,
अपने काम ही आएंगे।

यंत्र हमारे यंत्र से हो,
मंत्र हमारे मंत्र से।
खुद ही खुद के लिए चुने,
तंत्र हमारे तंत्र से।

सपना अपनों ने जो देखा,
आओ उन्हें साकार करें।
मुख मोड़ ले विदेशी से,
स्वदेशी स्वीकार करें।

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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने स्वदेशी अपनाने का आह्वान किया है, साथ ही स्वदेशी अपनाने के पीछे अपने तर्क को भी प्रस्तुत किया है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने अनन्वय अलंकार का प्रयोग किया है।

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