जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
विषय :- श्रम
शीर्षक :- श्रम ही पूजा
अलंकार :- अपह्नुति अलंकार
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नित ज्यों वंदन करते ईश की,
श्रम ही को जानो श्री राम।
श्रम ना कर्म यह पूजा है,
करते जाओ नित जोगी अविराम।
सकल जगत का सृजनकर्ता,
श्रम में ही है घनश्याम।
जिस दिन छूटे श्रम जीवन का,
समझो वह दिन पूर्ण विराम।
कोई काज ना छोटा होता,
सबका अपना है ऊंचा नाम।
नाम नहीं है जग में जोगी उसका,
करता है जो सतत आराम।
श्रम से पलते घर परिवार,
श्रम से मिलता उदर को आम।
सूरज संग श्रम आता है,
सुस्ताता जब ढ़लती शाम।
श्रम भोजन है, श्रम कपड़ा है,
श्रम ही है जगत का मकान।
श्रम की पूजा जो नर करता,
बढ़ता जग में उसका शान।
कर्म नहीं यह सेवा निज जीवन का,
श्रम सेवा सकल समाज का।
कोई श्रम ना अलग जगत में,
बस फर्क पड़ता अंदाज का।
श्रम नहीं आसान कहीं भी,
श्रमिक के स्वेद से है सिंचित फसल।
श्रम नहीं है सवाल जीवन का,
हर सवाल का जीवन में है श्रम हल।
नित ज्यों वंदन करते ईश की,
श्रम ही को जानो श्री राम।
श्रम ही पूजा है ईश्वर का,
करते जाओ नित जोगी अविराम।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने जीवन में श्रम की महत्ता को बताते हुए श्रम को ही पूजा माना है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने अपह्नुति अलंकार का प्रयोग करने का प्रयास किया है।
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