जिला -कांकेर,छग
शीर्षक-श्रम जीवी
विधा-कविता (मुक्त छंद)
अलंकार-अपह्नुति अलंकार
मेहनत जो
करता है,
दूसरों की
पेट की ज्वाला
बुझाने को,
वही आज
भूखा है दुःख
और पीड़ा के
साये में।
कपड़े जो बुनता है
दुनिया को ठिठुरन
से बचाने को।
वही आज कांप
रहा है ,
बुझते- सुलगते
राख के बीच।
मकान जो बनाता है
दुनिया का आशियाना
बचाने को,
उसी के सिर पर
छप्पर नहीं,
सिर कहां छुपायेगा
बेबसी तले।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
_________________________
अपह्नुति अलंकार-
1-पेट की ज्वाला।
2-बुझते-सुलगते राख।
3- सिर पर छप्पर।
4-बेबसी तले।
--------------------------------------
No comments:
Post a Comment