जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा- "रुपक अलंकार"
विषय- थलाकृति
शीर्षक- *प्रकृति की गोद में*
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प्रकृति की गोद में आज,
उद्भव हुआ नव दृग शिशुओं का ।
माॅं की रक्षा करने उद्धत,
कर्ज चुकाएंगे बूॅंद-बूॅंद आंसुओं का ।।
देखना है जोर हिमालयी इन बाजुओं में,
जप तप त्याग तपस्या से पहचान कैसा हिंदुओं में।
वैवस्वत मनु के ही संतान हैं,
आखिर विशालता कैसी है सिंधुओं में ।।
तुम धरनी धरती धारयिता हो,
वहन वहती यह जनयिता हो ।
रज रज में सहज भाव से,
प्रेममयी प्रेरक परम पूज्या प्रेरयिता हो ।।
थलाकृतियों से सुसज्जित हे धरा तुम सुसाध्य हो,
मैं हूॅं कोई दूरस्थ पाहन पर तुम मेरी आराध्य हो ।
सरिता सी शोणित मेरी प्रवाह है,
साथ तुम्हारा अजेय दुर्ग सा अबाध्य है ।।
मैं हूॅं विक्षिप्त मूढ़ मनस्वी यहाॅं,
मन के इस विरही व्यथा को सुलझाओ ।
एक अबूझ पहेली है यह जीवन,
नासमझ हूॅं मैं मुझे समझाओ ।।
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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
बहुत सुंदर
ReplyDeleteबहुत सुंदर
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