जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ़
विधा- कविता (रुपक अलंकार पर आधारित )
शीर्षक --धरती तेरी अद्भुत रचना
व्याख्या ---कवि के द्वारा धरती पर पाये जाने वाले जल थल गगन और उसके सौन्दर्य एवं धरती से जुड़ा मानव जीवन का वर्णन किया गया है ।
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धरती तेरी अद्भुत रचना
धरती तेरी अद्भुत रचना,जिस ओर निहारा पाया है।
कहीं जंगल कहीं पर्वत है, कहीं सागर बन समाया है ।
कहीं गांव बसे कहीं शहर है ।
कहीं सड़क बने कहीं नहर हैं ।
कहीं तेज धुप कहीं ऋतु बसंत ।
कहीं नदियों में बाढ़ आया है ।
कहीं गगन में दिखते उड़ते खग ।
कहीं वन में नजर आते हैं पेड़ ।
कहीं बागों में खिले खिले फूल ।
जिसे देख ए मन मुस्काया है ।
कहीं खेतों में फसलें झूम रहें ।
जिसे देख देख लोग घुम रहे ।
लगे ऐसा तूने किया है श्रृंगार ।
कहीं पवन ने धूल उड़ाया है।
कहीं लगे झरने गुनगुना रहे ।
मानो मानव को सुर पढ़ा रहे ।
पड़ते पत्थर झरनों का जल ।
दिखे इन्द्र धनुष समाया है ।
दिन में सूरज तुझे चमकाये ।
रात में चांद और चांदनी ।
सुबह ओस की बूंद चमकें ।
तू अनोखा जीवन पाया है ।
मानव भी तेरी गोद में है ।
जो जीवन मरण की खोज में हैं ।
मरण से वह बेबस लाचार ।
जीवन पर काबू पाया है ।
गिरधारी लाल चौहान
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