स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
शीर्षक -"रण योद्धा"(ध्वन्यार्थ व्यंजना अलंकार)
विधा- छंदमुक्त कविता
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बिगुल बज उठा है
रण में जाने को ।
शंख नाद हो चुका है
सर कटने- कटाने को ।
तलवारें निकल चुकी हैं
आपस में टकराने को ।
भाले भीषण चल पड़े
दुश्मन शीश गिराने को ।
चल पड़े हाथी देखो
रण की शान बढ़ाने को ।
दौड़ पड़े घोड़े ऐसे
वीर विजय दिलाने को ।
शत्रु प्रहार करे जब
ढाल है बच जाने को ।
योद्धा वही जो तैयार रहे
सदा न्यौछावर होने को ।
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