रायगढ़, छत्तीसगढ़
विषय-निंदा (भ्रांतिमान अलंकार)
विधा-मुक्त छंद काव्य
शीर्षक-पर-निंदा
ईर्ष्या से उपजता निंदा
पर निंदा कर सुकून की
नींद सोता रहता निंदक
जान नही पाता है वो
धूमिल अपना करता चरित्र
निंदक सोचता कर, पर निंदा
उसकी कही सब मानते
पर निंदा उसी की होती है जग में
जो दूसरों का भला सोचते
निंदा में भी रस है
जो आनंद है पहुंचाता
इस जैसा आनंद निंदक
और कहीं ना पाता
निंदा स्वभाव को निर्मल करे
निंदक होता कलुषित
जिसकी निंदा हो उसका नही
निंदक का होता दूषित।
निंदक नियरे राखिये ,आँगन कुटी छबाय , बिनु पानी बिनु साबना ,निर्मल करे सुहाय
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