Saturday, August 29, 2020

कांकेर से नलिनी बाजपेयी की रचना- निंदा

रचनाकार-नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, जिला-कांकेर छ. ग.
विषय-   निंदा(भ्रांतिमान अलंकार का प्रयोग)
     

 तुम सखा नहीं समंदर हो,
       मन के अंदर पाले बवंडर हो।
मुझे भ्रम हो गया था दोस्त हो,
        मगर तुम पूरे आडम्बर   हो।

मुझे लगता था प्रेम का 
      दरिया बहता है सीने में,
मगर अंगारों का ठिकाना 
        था तेरे सीने में।

मेरे पीछे शब्दों से किया 
    घायल और बेरूखी ने है रुलाया,मेरी निंदा करके 
       तो एहसान किया है,
तुमने तो नया तजुर्बा 
       सीखा राह दिखाया है।

लोग मिसालें दिया करते 
      थे हमारी  दोस्ती के,
शब्दों में ही जीते थे और 
        शब्दों में ही मरते थे।

तुम्हारे बाँहों का बल
          का गुरुर मुझे था,
बाँहों को ही जड़ काटने
           का हथियार बनाया था।

तुम सखा नहीं समंदर हो,
       मन के अंदर पाले बवंडर हो।

*भ्रांतिमान अलंकार का प्रयोग*
1.सखा नहीं समंदर हो
2.मन के अंदर पाले बवंडर हो
3.मगर पूरे आडम्बर हो।


   नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, कांकेर,(छ. ग.)

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