जिला - बलौदा बाजार ( छ. ग. )
विधा - छंद मुक्त कविता
विषय - निंदा
अलंकार - भ्रांतिमान अलंकार
शीर्षक - निंदा
समय बिताने के लिए ,
निंदा सस्ता साधन है ।
निंदा से सुख उपजत है ,
निंदा तो मनभावन है ।।
निंदा सबको प्रिय है ,
निंदा सबकी आदत ।
निंदा रसीली मिठाई है ,
विकृत मन की लालच ।।
अच्छे भले निर्दोष आदमी ,
दुर्जन पापी लगते हैं ।
भ्रम से उनके बारे में ,
निंदा रस टपकते हैं ।।
दुष्ट चोर बेईमान तो ,
लगते सज्जन साधु ।
निंदा की ऐसी महिमा ,
भ्रम से कोयला काजू ।।
निंदक का सम्मान करो ,
निंदक सच्चे हितैषी ।
दुर्गुण - दोष हटाते निंदक ,
परममित्र पारदर्शी ।।
संत - शास्त्रों के अनुसार ,
परनिंदा महापाप है ।
मन विचार में जहर घोलते ,
कलह बीज का बाप है ।।
सत्य को जाने बिना ,
झूठ का स्वागत करना ।
हल्के मन की भ्रमणा है ,
निंदा में गफलत करना ।।
यदि परिवार समाज में ,
होना पड़े न शर्मिन्दा ।
कान पकड़ कसमें खा लो ,
नहीं करेंगे परनिंदा ।।
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