जिला- कांकेर,छग
शीर्षक-लक्ष्य
विधा-कविता (विभावना अलंकार)
लक्ष्य पर जब ध्यान हो,
बिना मांगे मोती मिलते।
पर्वत दे देते यूं ही रास्ते
अनगिनत फूल खिलते।
सपनों के सागर में खोते,
अनमोल हीरे निकालते।
लक्ष्य -भेदी अस्त्र जब,
हकीकत के राह में मिलते।
बिना उत्साह के लक्ष्य कहां
भेद पाता है मानव यहां।
सुक्ष्म तृण पतवार बन जाता,
लक्ष्य उच्च आदर्श बन जाता।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
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