Saturday, August 1, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- लक्ष्य

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
   शीर्षक  -  " मेरा लक्ष्य "
     विधा - छंदमुक्त कविता 
अलंकार - विभावना अलंकार 
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माना लक्ष्य दूर है मेरा, 
पर हार मैंने कहाँ मानी है। 
मैं तो बिना पंखों के ही, 
आसमान छूने की ठानी है।।

इतिहास गवाह है मेहनतकश लोगों का, 
हमनें भी सुनी कहानी है। 
बेशक काँटों से भरी हैं ये राहें,
फिर भी बिना चप्पल चलने की ठानी है।। 

मुश्किलों से डर जाऊँ,
ऐसी मेरी पहचान नहीं। 
अर्जुन का मैं तीर हूँ, 
कोई मामूली कमान नहीं।। 

गिरता हूँ संभलता हूँ। 
फिर भी निरंतर चलता हूँ। 
नदी की तेज धार हूँ मैं, 
सीना चीर पत्थर की मैं बहता हूँ।।

मंजिल मेरी करीब है, 
बस उस पर मुझे जाना है। 
बिना मलहार के ही मुझे, 
मेरी नाव खुद को चलाना है।। 

दृढ़ संकल्प और दृढ़ निश्चय, 
कठिन परिश्रम ही गुरुमंत्र है। 
न होना कभी मायूस तू, 
असफलता ही सफलता का मूलमंत्र है।।

मेहनत करो इतना कि, 
सफलता की शोर मचने लगे। 
जीत इतना शानदार हो कि, 
बिन सूरज ही चाँद चमकने लगे।। 

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