जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा---कविता(विभावना अलंकार पर आधारित)
शीर्षक --- लक्ष्य ही लक्ष्य
व्याख्या ---कवि के द्वारा लक्ष्य को लक्षित करते हुए अपनी कल्पनाओं को यथार्थ के धरातल में पाने की चेष्टा का वर्णन किया गया है ।
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लक्ष्य ही लक्ष्य
अर्जुन की तरह लक्ष्य न मेरा।
न पेड़ पर किसी तरह की पक्षी ।
नहीं आंख का अचूक निशाना ।
फिर भी पक्षी जमीन पर गिर पड़ा ।
लक्ष्य मेरा धन कमाने की
फूटी कौड़ी भी कमाया नहीं ।
धन ही धन मेरे पास लगे
इस राह को आजमाया नहीं ।
लक्ष्य है मेरा कविता लिखूं।
गिनीज बुक में नाम लिखाऊं ।
एक भी कविता लिखा नहीं ।
पुरुस्कार की चर्चा सुनाऊं ।
उपन्यास का लक्ष्य मेरा ।
जबसे प्रेमचंद को जाना ।
शीर्षक खोज रखा हूं सबका ।
कहीं बैठे एक ही ठिकाना ।
लक्ष्य लेकर भटक रहा है मैं
मन के आस-पास
कोई कहता पूरा हो जाएगा
कोई कर देता निराश ।
न सुर न सुर के श्याम
न राधिका की अटारी ।
फिर भी बांसुरी बजाते बैठे
वहां मोहन गिरधारी ।
न नायक न नायिका फिर भी
विरह और मिलन ।
कविता लिखते आज के कवि
न कागज न कलम ।
अनसुनी कहानी
पल पल बसे मन ।
छलक रहे आंसू नयन
पता व्यक्ति का न जीवन ।
गिरधारी लाल चौहान
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