ग्राम - बुला़ंकी
जिला - रायगढ़
विधा - कविता
शीर्षक - "लक्ष्य"
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**लक्ष्य**
क्या है मनुज लक्ष्य तुम्हारा,
लक्ष्य का तुझे पता नहीं।
जिए जा रहे हो बेहोशी दुनिया में,
गति- गंतव्य का पता नहीं।
बिना लक्ष्य के कब तक यूं जिंदगी जिओगे मनु,
अब तो होश में आ जाओ।
अभी भी तुम्हारे पास अवसर है,
उस अवसर को मत गवाओ।
वर्तमान में जीना नहीं आ रहा है,
भविष्य की बात करते हो।
जिंदगी जीते नहीं बन रहा है,
पल-पल जीते मरते हो।
सुख, शांति ,संतोष ,आनंद,
यही तुम्हारा लक्ष्य है मनुज।
इस लक्ष्य को पाना है तुझे,
ज्ञान की रोशनी बल से।
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व्याख्या:-इस कविता में कवयित्री मानव वर्तमान में लक्ष्य विहिन हो जिंदगी जी रहा है ,इसीलिए समाज में अव्यवस्था दिखती है ।प्रकृति में असंतुलन दिखती है ।जब तक मनुष्य की लक्ष्य का पता नहीं होगा ,तो किस तरह मनुष्य उस लक्ष्य तक पहुंचने की दिशा बनाएगा। मनुष्य का लक्ष्य सुख ,शांति, संतोष, आनंद है। इसी लक्ष्य को पाने के लिए मनुष्य शरीर यात्रा कर रहा है। जब तक यह लक्ष्य नहीं मिल पाता, तब तक वह पुन: पुन: शरीर यात्रा करता है। इस लक्ष्य को मनुष्य ज्ञान के बल से ही अर्थात ज्ञान संपन्न होकर ही प्राप्त कर सकता है ।अतः मनुष्य को इस लक्ष्य को पाने के लिए ज्ञान संपन्न के लिए प्रयासरत रहना अति आवश्यक है। तभी मनुष्य को संतुष्टि मिलेगी। यही संतुष्टि ही मनुष्य का मोक्ष है। भ्रम से मुक्ति होना ही मोक्ष है । भ्रम से मुक्ति हो कर जीना ही संतुष्टि है। यही मनुष्य का अंतिम मूल लक्ष्य है।
उर्मिला सिदार
रायगढ़ छत्तीसगढ़
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