कवियित्री- चंदा प्रहलादका
कलकत्ता - ६४
शीर्षक- विश्वास
सघन तम के बादलों से ,घिर गई काली निशा है,
किरण स्वर्णिम का उजाला,साधती मन की दिशा है
बीतते पल-पल समाहित, नयन में नव आस लेकर ,
प्रात जागेगी सलोनी ,अब लगा विश्वास के “पर”।
बीज धीरज का डले जो, वृक्ष भावों से सींचते ,
फूल फल विश्वास के लग,स्वत:मंज़िल को खींचत
नयी कोंपलें दिन-प्रतिदिन,सेतु नभ तल से बँधा नित
चाहतों की डोर गूँथी, भावना विश्वास के हित ।
ओस की बूँदें धरा की , घास पर मोती चमकती,
तृप्त श्वासों की महक से,प्यार मधुमय ले चहकती।
धूप ताप से यूँ तपती,ग्रीष्म में अवनि का कण-कण,
रिमझिम बारिश की बूँदें, राहतों में हो सभी जन ।
दीपक जले विश्वास का, टूटते सारे भ्रम जाल ,
ओढ़े उजास की चादर ,अंतर संकल्प दृढ़ पाल ,
नहीं असंभव जग में फिर,मंज़िल है सामने खड़ी,
चाँद पर पहुँचा जहां है ,विश्वास बढ़ता हर घड़ी ।
ह्रदय अमृत रस बहा है।
विश्वास पर जीता जहां है।
स्वरचित
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