जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा- असम अलंकार
विषय- मित्रता
शीर्षक - "मनमीत"
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मीत मनमीत इक संगीत है,
जीवन सुहद राह पर व्यतीत है ।
कान्हा दौड़ आए द्वार तक,
अकिंचन सुदामा बुरा कहाॅं अतीत है ?
मीत मनमीत इक संगीत है.(१)
संगम त्रिवेणी का वह निर्मल जल,
नीत नाद निरंतर करते कल-कल।
गंगा धरती का प्रेम मिलन,
निश्छल भाव हो पल पल हर पल ।।
नीत नाद निरंतर करते कल-कल.(२)
बालपन का वह स्वर्णिम आज्ञा सविनय,
अर्पण समर्पण था वह प्रथम परिनय ।
खलनायक होत नायक जब,
जीवन कल्पित है कल्पनातीत अभिनय ।।
बालपन का वह स्वर्णिम परिनय.(३)
समर अमर है मृत्यु अनंता,
राम रावण निज में ही राम सा न कोई भगवंता ।
भाव अभाव की कैसी मनुष्यता,
बिन संकल्प विकल्प के हम मनुहंता ।।
समर अमर है मृत्यु अनंता..(४)
जीवन एक अध्याय है यहॉं न कोई पर्याय है,
सुख-दुख बिन समता के न्याय नहीं अन्याय है ।
सदा समय न कोई साथ देगा,
खुद मीत हो मनमीत हो रिश्तों का क्या अभिप्राय है ।।
जीवन एक अध्याय है यहॉं न कोई पर्याय है.(५)
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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
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