जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा-अनन्वय अलंकार
रचना- छंद मुक्त
शीर्षक- स्वदेशी
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दीप जले जो वहॉं प्रकाश भी मिलेगा,
बुलंद हो आगाज तो आकाश भी मिलेगा ।
स्वदेशी हो जाए यह देश तो,
पल-पल में विकास का फूल ही खिलेगा ।।
आजादी के हवन कुण्ड में कितने हवि हो गए,
खड्ग छोड़ क्रांतिकारी कागजी कवि हो गए ।
देश लहू टपकता शीश मांगता है,
जो सर कटाए वही आभामय रवि हो गए ।।
जन्मती धरा को स्वदेशी समर्पण चाहिए,
इक्ष्वाकु के वंशज तुममें राम सा अर्पण चाहिए ।
मान मॉं भारती का दिग दिगंतर दीर्घायु हो,
आज हवन में त्याग तपस्या तर्पण ही चाहिए ।।
सिंह के दांतों से गिनती सिखे ऐसा अन्य देश नहीं,
खौलता रक्त न कहे वो आवेग व आवेश नहीं ।
चूमना मौत के फंदे को आसान नहीं,
सुना है मातृभूमि की मौत सा संदेश नहीं ।।
इसलिए हे हिमालय के दिव्य शिखर पैगाम लाओ,
बेड़ियॉं तोड़ो मॉं को मेरा सलाम लाओ ।
अब भी गुलामी की परछाई है,
अरे कोई तो अग्नि की उड़ान वाला कलाम लाओ ।।
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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
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