कवयित्री- चंदा प्रहलादका
कलकत्ता,पश्चिम बंगाल
शीर्षक- जय श्री कृष्ण
दर्द देवकी बासुदेव का ,चुभ रहा अंतर प्रखर।
टोकरी में सुला कन्हैया,रात का अंतिम पहर।
उदिप्त चंद्रमा सा तेज मुख,दीप्तमान छवि मोहिनी ,
अधर मंद मुस्कान अवतरित,तल टिका निज कोहनी ।
बना गोकुल धाम पुण्य स्थल,आये नंद द्वार प्रभु,
कमल कोमल सदृश ह्रदय संग, देख अपलक मात प्रभु।
पुलकित ममत्व वात्सल्य रूप,प्रीत सुधि अद्भुत लहर ।
टोकरी में सुला कन्हैया , रात का अंतिम पहर।
दर्शाया ब्रह्मांड कंठ मुख,लीला विशाल रचते ,
सुध बुध खोई मात यशोदा,नैन से नीर बहते ।
एक कृष्ण पर भाव अनेकों, निज माया लपेट ली,
माँ यशोदा गोद में खेले ,उर ममता समेट ली ।
मोर पंख है भाल विराजे ,बाँसुरी चूमे अधर ।
टोकरी में सुला कन्हैया, रात का अंतिम पहर ।
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