जिला-महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक:"गुमराह"
विधा-कविता(तुकांत)
अलंकार-यमक
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अज्ञानता के वशीभूत होकर,
अक्सर हो जाते "गुमराह"।
बेर-बेर से तृप्ति-अतृप्ति,
तुष्टि मिले या देह को दाह।।
कानन-कानन शोभायमान,
निखरे नित-नित नूतन रूप।
एक सुशोभित करे धरा को,
कुंडल सुसज्जित बने सुरूप।।
लटकता दिखते हैं शुन्य में,
अधर को नहीं मिले आधार।
अधर दिखे जैसा बिंबाफल,
अति सुशोभित दिखे मुखार।।
चरण-चरण चल चले गये,
अनगिनत चाल से कोसों दूर।
बद्ध पंक्तियों में रचते चले,
काव्य सृजन के कल्पना पूर।।
बाला-बाला लगे अति मोहक,
पहने कर्णप्रिय सुंदर सुहाय।
पंखुड़ी सी कोमल जग सृष्टा,
अँगना औ आँगन शोभा पाय।।
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