Thursday, August 27, 2020

महासमुंद से विनोद कुमार "जोगी" की रचना- वर्षा रानी

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
विषय :- पर्यावरण का मानवीकरण
शीर्षक :- वर्षा रानी
अलंकार :- रूपकातिशयोक्ति अलंकार

#######################

हरितिम ओढ़े चादर सुन्दर,
उसपर मोती की बूंदें।
लूट लेता मनवा सब सुख,
निज नयनों को मूंदे।

रह रह कर फिर बरस रही है,
देखो प्यारी मेघा रानी।
उछल रहे नद नाले नटखट,
देख सुहानी वर्षा रानी।

हर्षित है उर गगन का,
चंचल चमके चपला रानी।
घड़घड गरज रहे हैं बादल,
रोज सुनाते नई कहानी।

फिर फिर किया श्रृंगार दुल्हन ने,
सज धज कर तैयार है।
महक रही है आज फिजाएं,
यह बारिश का त्यौहार है।

#######################

व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने प्रकृति की सुंदरता का वर्णन करते हुए कहा है कि बारिश के मौसम में धरती दुल्हन की तरह सजी धजी है और बहुत ही मनोरम दृश्य उभरकर प्रकट हो रहा है।
काव्य अलंकरण के लिए रचनाकार ने रूपकातिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग करने का प्रयास किया है।

No comments:

Post a Comment

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...