रायगढ़, छत्तीसगढ़
विषय-पर्यावरण का मानवीकरण
( रूपकातिस्योंक्ति अलंकार)
विधा-छंद मुक्त
विषय-तरुणी बादल
बादल घुंघराले ,काले अपने
बालों को लिए भटक रहा
जैसे कोई तरुणी अपने प्रेमी
से मिलने को व्याकुल हो
बादल के वक्ष स्थली से
बूंदें ऐसी टपक रहीं
जैसे प्रियतम से मिलने पर
आंसू खुशी से गालों पे ढुलक रहीं
बयार स्वागत में नाचते गाते दौड़ पड़ी
लताएं भी झाँक-झाँक जैसे देख रही
धरा हरे वस्त्र पहन अगवानी को बिछी पड़ी
आम पीपल और बरगद की डालियाँ भी झुमने लगी
बादलों की मस्ती में प्रकृति भी मस्त हुई
केकी,कोकिल और कीर भी सुर मिलाने लगी
आज सृष्टि लक्ष्मी बन उदित हुई
आशीर्वाद बन जैसे हम पर बरस पड़ी।
👌
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