रायगढ़ , छत्तीसगढ़
विषय-लक्ष्य
विधा-विभावना अलंकार
शीर्षक- बिन मांगे...
बिन देखे सपने साकार हो गए
बिन मांगे आज उनके दीदार हो गए
आकांक्षाओं ने उड़ने को पंख चाहा था
आज पंखों बिन आसमान छू लिये
पतझड़ के बाद बसन्त आती है
आज बिन बसन्त बासन्ती हो गए
तारे गिन-गिन रात गुजरती थी
आज सारे मेरे आँचल में बिखर गए
ऐसी स्निग्ध, उज्ज्वल और निर्मल
आज बिन चाँद हम चांदनी बन गए
आज जलाशय के सारे जलज आकर
जल बिन मेरे आँगन में खिल गए
भाँति-भाँति के रंग-बिरंगे फूल
बिन वाटिका के मेरे साँसों को महका गए
ठंड में ठिठुरती सी पड़ी थी मैं
बिन रजाई गर्मी का एहसास दे गए
अड़चने बहुत थी लक्ष्य की राहों में
आज बिन कदमो के ही आहट दे गए
बिन देखे सपने साकार हो गए
बिन मांगे आज उनके दीदार हो गए।
👌
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