रचनाकार-एच-एस-अरमो "अरमान "
निवासी-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
शीर्षक--""निंदा "" ।
विधा-कविता ।
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●●|||<>•~निंदा ~•<>|||●●
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तुझे चाहता बहुत हूँ,
पर तुझसे,मुझे प्यार नहीं ।
बेशक सहयोगी हूँ,मैं तुम्हारा,
पर दोस्त ,हरगिज़ नहीं ।
तेरा रंग है,गोरा-गोरा,
पर,तेरे कारनामे हैं,काले-काले ।
तेरा काम है,ऐसा,
दिखे सबको,अच्छा-अच्छा ।
पर हो तुम,बिलकुल वैसी ही,
जैसे-मुँह में राम,बगल में छुरी ।
आंख होते हुए भी,
तुम चलते हो,अन्धे की तरह,
अपने लिए,देखने में है,सब ठीक ,
पर,दूसरों के लिए,होते तुम अन्धे।
श्याम रंग है तेरा,
कहते तुझे,कोयला-सा काला,
पर तन जैसा दिखता है,
मन,वैसा नहीं है,तेरा ।
धनवान हो,कुबेर जैसे,
पर,उदारता झलकती नहीं वैसे,
अजगर की तरह,तुम बैठे हो,
अपने धन में,कुंडली मार के हो ।
नेता को चुना हमने,
अपना समझकर,सबके साथ,
अपना रंग ,बदल रहे हैं,वो,
और चूना लगा रहे,नादा समझ के ।
हिंसक जानवरों को,पालतू बनाया,
छोटे से पिंजड़े में डाल के,
खूब खिलाया-पिलाया,हमदर्द मान के,
पर,ना जाने क्यूँ,बदल गया आज ,
जंगली-वहशी जानवर बन के ,
मुझे मार डाला,अपना दुश्मन मान के।
कोयल और कौआ दिखे एक समाना,
कौवा पाले,उसके बच्चे को,जान अपना,
बोली से,पहचान लेता,उड़ जाता वो,
अनजान समझ,विश्वास तोड़ के वो।
रतनजोत का,फल और बीज ,
खाया हमने,स्वादिष्ट समझ के,
दिया धोका,मीठा -जहर बन के,
नादानी,नादान की तरह,हम कर बैठे ।
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व्याख्या-उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि निंदा के कई रूप में प्रस्तुत किया है ।जिसके भाव अलग अलग हो सकते हैं ।
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