जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
विषय :- निंदा
शीर्षक :- निंदक
अलंकार :- भ्रान्तिमान अलंकार
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निंदा के भ्रम में निंदक ने,
अपनी कमियां गिनवाई।
करके सुधार उन कमियों पर,
मंजिल फतह हो पाई।
पहले पहल हम भ्रम में ही,
निंदक से चिढ़ जाते थे।
अपनी कमियों का खुलासा,
जग हंसाई बतलाते थे।
पर जग जाहिर यह बात हुई,
निंदक का होना है सौगात।
हर कर तिमिर जीवन का,
दे जाते हैं नवल प्रभात।
पर भ्रम में रिपु है निंदक,
निंदक को लगते हम दुश्मन।
लेकिन निंदक के निंदा से,
निर्मल होता यह कलुषित मन।
इसलिए कहा है कबीर ने,
रखलो निंदक पास।
बिन पानी जो करता है,
निज दुर्गुण का त्रास।
वह निंदक ही है जिसकी कृपा से,
निज में कला निखर पाई।
लाकर निखार निज के कर्मो में,
मंजिल फतह हो पाई।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने कहा है कि भ्रमवश निंदक ने यह मान लिया था कि वह हमारी निंदा कर रहा है, वहीं हम भी सदा यही मानकर उससे चिढ़ जाते थे। परन्तु सत्य तो यहीं है कि उसने हमारी कमियों से हमें अवगत कराया जिससे हम अपने में सुधार कर सफलता के शिखर को छू पाए।
उपरोक्त पंक्तियों में काव्य अलंकरण के लिए भ्रान्तिमान अलंकार का प्रयोग किया है।
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