देवयानी शुक्ला
02. जिला :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
03. छंद :- मुक्तक
04. रचना का शीर्षक :- *गुमराह*
सफ़र में ज़िंदगी के
कभी ऐसा भी होता है ,
कभी गुम राह होती है ;
कोई गुमराह होता है ।
ज़रा दो लफ़्ज़ अपनेपन के
कहना सीख लो यारों ,
वहीं परवाह होती है ,
जहाँ पर वाह होता है ।
दिलों में दाग़ (ईर्ष्या) लेकर जीने वालों !
ये भी तय कर लो ,
दाग़ (कलंक) चाहत पे लगाना भी
गुनाह होता है ।
मुझे कह ना (मत कहो) कि कह ना (बोलो)!
कह ना पाऊंगी ;
कि कहने से ही अक्सर
मामला तबाह होता है ।
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