जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा-भ्रांतिमान अलंकार
विषय- निंदा
शीर्षक- "मन का पंछी"
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कोई प्रशंसा थी या यह निंदा थी,
उसके शब्द संग मुस्कान भी चुनिंदा थी ।
शब्द-शब्द में भाव कई,
हाव भाव में मन उड़ती हुई परिंदा थी ।।
शब्द बैठे कान में जैसे यहीं बाशिंदा थी,
सुनकर काठ सा अकड़ा मुर्दा थी या जिंदा थी ।
उड़ने लगी थी दूर गगन में,
पंछी मन की स्वयं हुई सुनंदा थी ।।
ठॉंव यहाॅं वहाॅं जहाॅं मिले अच्छा,
तिनका-तिनका बिखर गई एक वही घरौंदा थी ।
पास ही महकता था चमन सुगंधित,
महका-महका बयार कहे यहीं वो रजनीगंधा थी ।।
डाल-डाल पात-पात में खुशियों की पुलिंदा थी,
शब्दों का जाल बिछाया शब्द ही वो दरिंदा थी ।
मायाजाल में उलझी कोई मकड़ी सी,
खुद की डोर में खुद बंधी आज हुई शर्मिंदा थी ।।
कोई प्रशंसा थी या यह निंदा थी...
उसके शब्द संग मुस्कान भी चुनिंदा थी ....
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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
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