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रचनाकार-एच-एस-अरमो "अरमान "
निवास-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
शीर्षक--"" सेवा बनाम श्रम """ ।
विधा-कविता ।
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☆●<<||सेवा बनाम श्रम ||>>●☆
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बड़ी मेहनत-जतन से,सेवा की है मैंने,
मैं,नाम नहीं चाहता,पर पाना है सम्मान ।।
मेरे शिल्पी हाथों के श्रम से,
बना था,यादगार ताजमहल ।
न बन सके,दूजा स्मारक ,ऐसा कोई,
उनकी सेवा का फल,अपाहिज बना दिया ।।
रामभक्ति की सेवा में,हुये लीन,
अंजनी कुमार,वीर हनुमानजी,
न कोई लोभ और न कुछ है पाना,
पर,बना के,केशरी तन,प्रभु को जाना।
गरीबों की मदद,शासन ने,ऐसी की,
बने वो आलसी,कुछ मादकता भोगी,
न कोई चाहता वो,श्रम का ऐसा काम,
मिल रहा मुफ़त अन्न,बिना काम ।
सेवा से श्रम जुड़े,मिले उसे प्रतिफल,
करते-करते,आगे बढ़े,होता सफल ।
मजदूर जब कहीं,काम है करता,
कुली व रेजा,उसका नाम है पड़ता ।
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व्याख्या 'उपरोक्त रचना के माध्यम से यह कहना चाहता हूँ कि सेवा व श्रम सच्चे मन से करता है तो उसे उसका सही प्रतिफल मिलता है ।
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