जिला-कांकेर, छग
शीर्षक-निंदा रस
विधा-कविता (मुक्त छंद)
अलंकार-भ्रांतिमान अलंकार
निंदा में मिलाकर
शहद-सा रस
बहुत सलीके से
पेश करने का
हूनर सीख लोग
स्तुति करते हुए
प्रतीत होते हैं।
आनंद की अनुभूति
कर बहुत सुंदर
रचना करते हैं
कहानियों का
पर भूल जाते हैं
कि इससे आहत
गुमराह व्यक्ति
भ्रम में जीता है।
तारीफ करते हुए
कमियों का समंदर
गिना जाना भी
निंदक की हमेशा
नियति रहती हैं।
यह भी सच है कि
अपना पीठ कोई
देख नहीं पाता,
पर चेहरा एक
आईना है जो बता
देता है कि निंदक
कितना बड़ा
मुखौटा लगाए हैं।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर,छग
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भ्रांतिमान अलंकार-
1-स्तुति करते प्रतीत होते हैं।
2-कमियों का समंदर।
3-कितना बड़ा मुखौटा।
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