जिला -कांकेर,छग
शीर्षक- श्रीराम
विधा-कविता (मुक्त छंद)
राम हमारी संस्कृति हैं
राम हमारी मर्यादा हैं
राम ही हमारे गौरव हैं,
राम से अभिलाषा है।
राम हमारी सांसों में,
दुख और वनवासों में।
रोम-रोम में राम बसे,
सुबह और शाम बसे।
चरखे में भी राम बसे,
हर नाम के बाद बसे,
राजा राम, सीता राम,
कण- कण में हैं राम।
राम भक्ति ,राम शक्ति है
राम जीवन का आधार।
राम सबके नाव खेबैया,
राम ही जग तारण हार।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
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श्लेष अलंकार-
*राम*-नाम,शक्ति, भक्ति, संस्कृति।
*तारण हार*-उपाधि,दिव्य शक्ति,
पार लगाने वाला।
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