Thursday, August 6, 2020

जांजगीर-चांपा से गिरधारी लाल चौहान की रचना- आदर्श ग्राम

नाम----गिरधारी लाल चौहान
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा---कविता(वीप्सा अलंकार पर आधारित)
शीर्षक ---आदर्श ग्राम 

व्याख्या ---कवि के द्वारा  ग्राम विकास की कल्पना की गई है ग्राम के विकास में महत्व पूर्ण कारक है शिक्षा शिक्षित समाज में स्वरोजगार की ओर लोग उन्मुख होते हैं ।जो भी कार्य है लगन और निष्ठा के साथ पूर्ण करते हैं ।व्यक्ति के हाथ में जब आय होता है तो उसकी क्रय शक्ति बढ़ती है ।अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति होती है । जिससे जीवन सुखमय और खुशहाल बनता है ऐसे ही  देश के सब ग्राम बने और आदर्श ग्राम की परिकल्पना है इसका विस्तार और अनुकरण हो । जिससे ग्राम -ग्राम न रहे स्वर्ग बन जावे ।
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आदर्श ग्राम

ग्राम- ग्राम बदल रहे आज ,परिश्रम -परिश्रम करके ।
बहा -बहा रहे सुख की गंगा,जी रहे थे जो मर -मर के।

खेत- खेत में फसल लगे ,गली -गली  में  उगे पेड़  ।
आंगन -आंगन  सुंदर औषधि ,बाड़ी में केर- बेर ।

घर-घर दिख रहे अनाज,  सुख समृद्धि  का ताज ।
गरीब-गरीब यहां कोई नहीं,सब अपने  में महराज ।

पानी -पानी रोते थे आज, घर -घर नल और जल ।
चीमनी कैण्डल जलते थे,आज सी एफ एल बल्ब ।

सड़क सड़क रटते थे, आज चार पहिया दौड़ रहे ।
सूखी लकड़ी को तरसते थे, गैस के कारण छोड़ रहे ।

अस्पताल ,डाकघर ,आंगनबाड़ी,सबका लग रहा मेला ।
सबके मकान है पक्के सुंदर,जो रहा करते थे तबेला ।

शिक्षा-शिक्षा ने सबको बदला, कोई यहां नहीं अशिक्षित ।
स्वरोजगार से सबने सम्हला,अब कोई भी नहीं कुण्ठित ।

हाथ -हाथ में काम पाएंगे,हाथ -हाथ में  लिख रहे भाग्य ।
ऐसा हो सब ग्राम देश के, यही - यही है मेरा ग्राम स्वराज्य ।

गिरधारी लाल चौहान

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