रायगढ़, छत्तीसगढ़
विषय - गुमराह
विधा- यमक अलंकार का प्रयोग
शीर्षक- घिर आई हैं घटाएं
आज फिर घिर आई है घटाएं
घटा मेरे आत्मविश्वास को
झर-झर बरस रही हैं बूंदे
अतृप्त आंखों से
अतृप्त धरा पर
आज फिर गुम हैं दिशाएँ
दिखा कर मेरे मंजिल को
रास्तों पे भटकते गुमराह
खड़े हैरान हैं कभी खुद पर
तो कभी क्षितिज पर
आज ढूंढ़ रहे हैं सहारे
दिखा कर मेरे कमजोरियों को
गुमराह राहों पर दीप जलाये
उम्मीद है कुल दीप की
जो रोशन करे कुल को
आज टूट रहे हैं आशाएँ
इस शहर की कोई सहर नही
गुमनाम अंधेरों के सिवा
अब कोई ठौर नही
झर-झर बरस रहीं हैं बूंदें
अतृप्त आंखों से
अतृप्त धरा पर।
👌
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