कवयित्री -चंदा प्रहलादका
कलकत्ता पश्चिम बंगाल
शीर्षक- पलकों के किनारे बहता एक आँसू
पलकों के किनारे बहता एक आँसू,
राज मन के खोले ,गहरा, एक आँसू ।
ताजिंदगी सहे क्यों सितम जमाने के,
दर्द बन पलकों में उभरा एक आँसू ।
बयां हाले दिल कपँकपाते अधर है,
चमन के खिले फूल क्यूँ जाते बिखर है ।
वजूद मिटा शाख़ के टूटे पत्तों सा ,
खुदी प्यार की कब्र,खो जाने का डर है ।
ढूँढता दर बदर आशियाँ एक आँसू ।
पलकों के किनारे बहता एक आँसू ।
नभ तल को छूती परछाई ग़म की,
सितारे बहकते हुई रातें नम सी ,
यूँ बरसते हुए मेघ रोये तड़पकर ,
प्रिय दुनिया सूनी ये दिखती है भ्रम सी।
ह्रदय जड़ हुआ स्वप्न सींचे एक आँसू ।
पलकों के किनारे बहता एक आँसू ।
विरह श्वासों में गूँथे माला व्यथा की,
चितवन स्पंदित अभिनव रंगी कथा सी,
शिथिल प्राण ऊर्जा,ना आंके निमिष हार,
उनींदी है अभिसार की वृक्ष लता सी ।
तिमिर राग छेड़ फिर बिखरा एक आँसू ।
पलकों के किनारे बहता एक आँसू ।
स्वरचित
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