Thursday, August 13, 2020

कलकत्ता, पश्चिम बंगाल से कवयित्री चंदा प्रहलादका जी की कविता-पलकों के किनारे बहता एक आँसू

कवयित्री -चंदा प्रहलादका
कलकत्ता पश्चिम बंगाल
शीर्षक- पलकों के किनारे बहता एक आँसू 

पलकों के  किनारे बहता एक  आँसू,
राज मन के खोले ,गहरा, एक आँसू ।
ताजिंदगी सहे क्यों सितम जमाने के,
दर्द बन  पलकों में  उभरा एक आँसू ।

बयां  हाले   दिल कपँकपाते अधर है,
चमन के खिले फूल क्यूँ जाते बिखर है ।
वजूद   मिटा   शाख़  के  टूटे  पत्तों सा ,
खुदी प्यार की कब्र,खो जाने का डर है ।
ढूँढता  दर   बदर आशियाँ  एक  आँसू ।
पलकों के   किनारे  बहता  एक आँसू ।

नभ  तल  को  छूती  परछाई  ग़म की,
सितारे   बहकते   हुई  रातें   नम सी ,
यूँ  बरसते  हुए  मेघ  रोये   तड़पकर ,
प्रिय दुनिया सूनी ये दिखती है भ्रम सी।
ह्रदय जड़ हुआ स्वप्न सींचे एक आँसू ।
पलकों  के  किनारे बहता  एक आँसू ।

विरह  श्वासों में  गूँथे माला व्यथा की,
चितवन स्पंदित अभिनव रंगी कथा सी,
शिथिल प्राण ऊर्जा,ना आंके निमिष हार,
उनींदी   है  अभिसार  की वृक्ष  लता सी ।
तिमिर राग छेड़ फिर बिखरा  एक आँसू ।
पलकों  के  किनारे  बहता   एक आँसू ।
स्वरचित 
चंदा प्रहलादका

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