देवयानी शुक्ला
02. जिला :- रायपुर (छत्तीसगढ़)
03. छंद :- मुक्तक(वीप्सा अलंकार)
04. रचना का शीर्षक :-
*गांव-गांव चलें*
पुलिंदे यादों के उठा के
गांव-गांव चलें ,
हरे खेतों
भरे खलिहानों तक
पांव-पांव चलें ।
ये जो दिखती है
सड़क-सी
सड़क ही थी ये कभी ,
विकास पेंच-पेंच आया
दांव-दांव चले ।
शहर की बदहवा से इसको हम बचा ना सके ,
दरख़्त कट गये ,
अब किसकी छांव-छांव चलें ?
रोटी-रोटी की
रट लगाते हुए ,
शहर में मारे-मारे
गांव ठांव-ठांव चले ।
खुशहाली आएगी ;
हालात भी अच्छे होंगे ,
मशाल ले के बशर्ते
सभी उमराव चलें ।।
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*उमराव* :- अमीर,कुलीन जन
*वीप्सा अलंकार*
गांव-गांव
पांव-पांव
दांव-दांव
छांव-छांव
ठांव-ठांव
रोटी-रोटी
मारे-मारे
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