स्थान-----नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा- कविता (रुपकातिशयोक्तिअलंकार पर आधारित )
शीर्षक --पर्यावरण और मानव की वफादारी
व्याख्या ---कवि मानव द्वारा पर्यावरण के प्रति जागरूक होना एवं उनके सुधारात्मक कृत्यों का वर्णन किया गया है ।
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पर्यावरण और मानव की वफादारी
पर्यावरण पर आजकल,मानव की वफादारी तो देख ।
जिन्हें हाथों से उजाड़ रहा था, लगाने का छप रहा लेख ।
नदियों पर विचार धाराएं बदली, प्रदूषित नहीं कर रहा ।
स्वच्छ करने पर लगा,अस्वच्छता से अब वह उबर रहा ।
सबको समझाता फिरता , लिख नारें दिखा तख्तियां ।
चला रहा कार्यक्रम , करता फिरता सभाएं जुलुस रैलियां ।
पेड़ों के प्रति दृष्टिकोण बदला, गिरते गिरते अब वह सम्हला
अंधाधुंध काटता फिरता था, रक्षा की ओर है निकला ।
रोपण में रुचि जगी उसका, जागरण के उसमें भाव जगे ।
समझा रहा लोगों को सबका महत्व ,क्या अनपढ़ पढ़े लिखे ।
वर्षा भी मूसलाधार है, धीरे-धीरे छंट रहे धरा से अकाल ।
धरती अनाजों से हो रही सुशोभित, भूखे पेट का मिटा सवाल ।
मिट्टी का कटाव रुका है,जल ,वायु ,धुआं प्रदूषण से हैं रहित
धरा की सांस मुस्कुराहट में बदली, शांति का बज रहा संगीत
धरा के साथ साथ आसमान,अब नई सपनों की ओर है ।
नये स्वप्न जीवन जगाते,उसी का जग में बहुत जोर है ।
प्रकृति को नहीं उंगली दिखाता,स्नेह नीर से सींच रहा ।
किसी दिन बड़े होंगे काम आयेंगे भविष्य उससे लिख रहा
सबका जीवन सुरक्षित संरक्षित, नई दिशा की ओर है कदम
पर्यावरण और मानव का हो चुका है अद्भुत अनुपम संगम ।
गिरधारी लाल चौहान
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