जिला :- महासमुंद
विषय :- युद्ध
विधा :- छंद मुक्त कविता
अलंकार :- ध्वन्यार्थ व्यंजना अलंकार
शीर्षक :- भाव युद्ध।
#######################
#######################
लो शंखनाद से फिर,
हुआ पुनः ही युद्धघोष।
कलम कड़कती काॅपी में,
खुल गए हैं फिर से शब्दकोश।
सर- सराते शब्दों का सैलाब,
मन में विचरते विचार।
भड़भड़ाता बवंडर भावों का,
भरते मन ही मन हुंकार।
चेतना चीत्कार करती,
यहां वहां है पेंग भरती।
युद्ध छिड़ा जो घमासान है,
भाव अविरल है बह पड़ती।
बैठा हथियार ले कलमकार,
उकेरे निज के मनुभाव।
कभी बिखेरता खुद के खुशी को,
कभी दिखाता निज उर घाव।
गर्जन तर्जन से बरसा होती,
कलमकार के भावों की।
कभी दिखाता जीवन के धूप,
कभी जिक्र है छांवों की।
तट - धई, ता - तट ताण्डव करती,
भड़क रही है भावों की ज्वाला।
मानो विचार लड़ पड़ते हैं,
मारे एक दूजे को भाला।
इस तरह विचारों के द्वंद में,
छिड़ा अनोखा भाव युद्ध।
भावों के युद्ध से कर लेता,
रचनाकार रचना विशुद्ध।
#######################
#######################
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने कवि मन में उठे भाव युद्ध को अपने शब्दों में पिरोने का प्रयास किया है।
साथ ही रचनाकार ने काव्य अलंकरण के रूप में ध्वन्यार्थ व्यंजना अलंकार का प्रयोग करने का प्रयास किया है।
No comments:
Post a Comment